सामान्य श्राद्ध – पूजा





मान्यता के अनुसार अपने पितरों की स्मति में श्रद्धापूर्वक किया गया दान आदि कर्म ही श्राद्ध है। कई जानकारों के अनुसार अपने पूर्वजों की स्मति में दान, भोजन दान के अलावा पेड़ लगाना किसी असहाय की सहायता करना, रोगी की आर्थिक या शारीरिक सहायता करना, पुस्तक, वस्लदान करना भी श्राद्ध के अंतर्गत ही आता है।
माना जाता है कि हर मास की अमावस्या पितरों की दोपहर होती है। दोपहर में हीं भोजन किये जाने का नियम होने से हर अमावस्या को पितरों की तिथि मानकर अन्र आदि का दान करने का नियम है।
किसी मंगल कार्य के अवसर, ग्रहण काल, पूर्वजों की मुत्य तिथि पर, तीर्थयात्रा में भी श्राद्ध करना कल्याण कारक होता है। सूर्य के कन्या राशि में रहने के दौरान कन्या-गत या कनागत मानने का नियम है।
सामन्य श्राद्ध निम्नलिखित तरीके से होता है :-
1: तर्पण
2: तिल दान
यह सेवा सिर्फ “धर्मनगरी-हरिद्वार” में उपलब्ध है।
मोक्षप्रदा पतित-पावनी माँ श्री गंगा जी की धरती व देवभूमि के द्वार हरिद्वार की पावन धरा पर हम आपको पूजा-पाठ, दान-पुण्य एवं तीर्थयात्रा करने की समस्त सुविधाएं व सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।
धर्मनगरी हरिद्वार में किये गये पूजा-पाठ, दान-पुण्य का सर्वाधिक और अलौकिक लाभ व्यक्ति को मिलता है।
पुराणों और शास्त्रों के अनुसार धर्मनगरी हरिद्वार को ही पूजा-पाठ, दान-पुण्य करने के लिए सबसे सर्वश्रेष्ठ, महत्वपूर्ण, उत्तम एवं उपयुक्त तीर्थ-स्थान माना गया है, एवं चारधाम तीर्थयात्रा तो होती ही शुरू “धर्मनगरी हरिद्वार” से है।
पुराणों व शास्त्रों में कहा गया है कि व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार हरिद्वार जा के गंगा स्नान कर पूजा-पाठ व दान पुण्य करना चाहिये, क्योंकि इससे व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हरिद्वार को “मोक्ष का द्वार” भी कहा जाता है।
धर्मनगरी हरिद्वार भगवान शिव जी, भगवान विष्णु जी और माँ श्री गंगा जी की भूमि है, इसलिये इसको “देवताओं का प्रवेश द्वार” कहते हैं।
हरिद्वार को “धर्मनगरी”,”माँ श्री गंगा जी की धरती”,”कुम्भ-नगरी”,”देवनगरी”,”मोक्ष का द्वार”,”देवताओं का प्रवेश द्वार”,”हरि का द्वार”,आदि नामों से भी जाना जाता है। भगवान शंकर जी की ससुराल “कनखल” भी हरिद्वार में ही है। इसलिये हरिद्वार को विश्व की “आध्यात्मिक राजधानी” कहा जाता है।
- पितरगण मनुष्य को पुत्र प्रदान कर वंश का विस्तार करते हैं।
- श्राद्ध-कर्म से मनुष्य की आयु बढ़ती है।
- श्राद्ध-कर्म मनुष्य के शरीर में बल-पौरुष की वृद्धि करता है और यश व पुष्टि प्रदान करता है।
- पितरगण स्वास्थ्य, बल, श्रेय, धन-धान्य आदि सभी सुख, स्वर्ग व मोक्ष प्रदान करते हैं।
- श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाले के परिवार में कोई क्लेश नहीं रहता वरन् वह समस्त जगत को तृप्त कर देता है।
श्राद्ध-पूजा प्रक्रिया विवरण :-
- पूजा के लिये दिनों की कुल संख्या : 1 no.
- पूजा के लिये पंडितों की कुल संख्या : 1 no.
चैरिटी : Rs. 4,300/Couple/Head
- पूजा के लिये समस्त पूजन सामग्री : Rs. 2100
- पूजा के लिये प्रत्येक पंडित को दक्षिणा : Rs. 1100/पंडित
- पूजा के लिये एक दिन का पूजा-स्थल/ यज्ञशाला के लिये दान : Rs. 1100/दिन (Optional)